“नीतीश कुमार यानि समाजवादी राजनीति का मीर जाफ़र।”
मीर जाफ़र को अंग्रेजों ने बंगाल का नवाब बनाया था,लेकिन वह “नवाब” नहीं बल्कि अंग्रेजों की मुट्ठी में बंधी एक कठपुतली था।
जिस फौज
का वह सेनापति था, जिस जमीन की रक्षा की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी, उसी जिम्मेदारी को उसने उस निर्णायक क्षण में ठुकरा दिया। जब इतिहास उससे साहस, निष्ठा और प्रतिरोध की उम्मीद कर रहा था।
ऐन वक्त पर , युद्ध के मैदान में, जाफ़र "पलट" गया।
"पलटी मारकर" उन अंग्रेजों के साथ जाकर खड़ा हो गया जिनके विरुद्ध उसे सिराज के लिए, बंगाल की सरजमीं के लिए लड़ना था।
गद्दी का मोह उस पर इस कदर हावी था कि वह अपने वादे पर कायम नहीं रह सका। रॉबर्ट क्लाइव के मुट्ठी भर अंग्रेजों से उसकी जीत तय थी लेकिन उसने उसे पराजय में बदल दिया। वह इतिहास में अमर हो सकता था। लेकिन उसने भारत का वह दरवाज़ा अंदर से खोला
जिसके जरिए अंग्रेज घुसे और अगले 200 वर्षों तक उनकी गुलामी ही भारत की नियति बन गई।
युवा सिराज, जिसने अंग्रेजों को बराबर चुनौती दी थी, जिसमें जुनून, साहस और भविष्य की चमक थी। वह सिराज एक रात धोखे से मरवा दिया गया, और उसी रात भारत का भविष्य पलट गया।
यह सब सिर्फ इसलिए संभव हुआ, क्योंकि "मीरजाफर" पलट गया था।
प्लासी का इतिहास ने खुद को दुहराया है। बस पटना आज का नया प्लासी है।
राजनीति के इस नए प्लासी में भी एक समर्थ और तेजस्वी युवा सिराज हैं। ऊर्जा से भरा, उम्मीदों से भरा, अपनी जनता और अपने दौर पर सच्चा विश्वास लेकर आगे बढ़ते हुआ।
लेकिन राजनीति में सबसे ख़तरनाक शब्द हमेशा वही रहा है : "विश्वास"।
और विश्वास का टूटना ही हर प्लासी की असल कहानी है।
इतिहास कहता है कि हर प्लासी में एक मीर जाफ़र अवश्य होता है।
आज के इस प्लासी के नवाब नीतीश कुमार हैं।
नीतीश भी चाचा हैं, मीर जाफर भी एक तरह से चाचा ही था। एक पीढ़ी ऊपर का!
नीतीश कुमार, जो समाजवाद की मिट्टी में रोपित होकर निकले थे, अब पूरी जड़ों समेत संघ-भाजपा की राजनीति को पोषित कर रहे हैं। एक ऐसा नेता जो सिर्फ सत्ता में रहना जानता है। कुर्सी के अलावा कुछ नहीं पहचानता है। समाजवादी आंदोलन के इतिहास में नीतीश कुमार का नाम सत्ता-प्राप्ति के कौशल के साथ भले दर्ज हो, लेकिन सिद्धांतों और कर्तव्यों की रक्षा में वह उतने ही विफल दिखाई देते हैं जितना मीर जाफ़र अपने दौर में था।
समय में यह दर्ज हो रहा है कि नीतीश किस तरह बस कुर्सी के लालच में संघ के कठपुतली बनकर रह गए हैं। उनके सारे निर्णय, उनके सिपहसालारों की हरकते सब कुछ कहीं और से तय हो रहा है।
समय का निर्णय कठोर है, लेकिन इतिहास उससे भी कठोर।
और इतिहास नीतीश कुमार को जल्द ही उनकी जगह दिखाएगा।
प्लासी की जीत के बाद मीर जाफर भी ज्यादा दिनों तक नवाब नहीं रह सका था। आज भी मुर्शिदाबाद में उसकी खंडहर हो रही हवेली को लोग "नमकहराम ड्योढी" कहते हैं।
इतिहास नीतीश कुमार को भी याद रखेगा:
“नीतीश कुमार यानि समाजवादी राजनीति का मीर जाफ़र।”
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