पाठशाला की जगह लेता मधुशाला
हमारा देश महाज्ञानिओं का देश है यहाँ का अध्यात्म पुरे विश्व में प्रसिद्ध है| हमारे राष्ट्र में ऋषिमुनियों के चिंतनधारा का निचोड़ वेद पुराण है | इस निचोड़ के माध्यम से सामाजिक समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया गया था और आज भी तमाम उल्लेखों से किया जाता है | उसमे शिक्षा का विशेष स्थान था इसीलिए व्यक्ति के कर्म अनुसार कार्य का विभाजन किया गया था | मानव समाज के उत्थान के लिए अनेक गुरुकुल का निर्माण तक से किया |
जैसे जैसे विज्ञानं का विकाश होता गया लोग अध्यात्म से दूर होते गए | सामाजिक कुरुतियां हावी होने लगी | जिसकी वजह से लोगो में आपसी प्रेम सौहार्द का कमियां आने लगी | तमाम व्यवस्थायें आयी और गयी | परिवर्तन का चक्र हमेश एक जैसा नहीं रहता |भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शिक्षा को सबसे उत्कृष्ट स्थान दिया गया है | शिक्षा का समग्र विकास के लिए गावों से शहरों तक अनेक स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय खोले गए | शिक्षा जन जन को मिले इसलिए सस्ती शिक्षा को जन जन तक पहुंचाने के लिए हर स्तर से प्रयास किया गया |
देश की आज़ादी के बाद कुछ सरकार ऐसी आयी जो शिक्षा का उदारीकरण करने के बजाये पूंजीपतियों या राजनेताओं को निजी संस्था खोलने का मौका देने लगी | उसके परिणाम स्वरुप आज सरकारी संस्थाए बंद होने लगी और स्कूली मानक के विपरीत गलियों में स्कूल कॉलेज खुलने लगे |
निजी संस्थाए शिक्षा का सबसे अच्छा साधन बन गया और सरकार इनके सामने घुटने टेकने लगी उसके भी एक कारन और है की शिक्षिक अपने नैतिक कर्तव्य से विमुख हो गए | उन्हें अच्छा वेतन मिलने के बाद भी पैसा कमाने की लत ने स्कूली शिक्षा का स्तर बिलकुल गिरा दिया | लिहाजा सरकारी स्कूलों का हाल खस्ता होता गया | समस्या ये नहीं की वो कितना कमा रहे है बल्कि पहले की सरकार शिक्षा से कितने लोग लाभान्वित हुए वो इस पर ध्यान देती थी उसे उस पर कितना खर्च हुआ या किया गया उसका आकलन नहीं करती थी |
आज देश पूंजीवाद की ओर है | पूंजी कहाँ से आये, कैसे राजस्व बढे, उनकी खुद की सुविधा कितना अधिक से अधिक मिले, लोगो से टैक्स कैसे वसूला जाये इत्यादि पर निर्भर हो गयी है | देश का उत्थान कैसे किया जाये, कैसे देश को विकसित राष्ट्र बनाया जाये आदि पर विचार नहीं किया जाता |
सबसे मजे की बात ये है की जो लोग इसमें लिप्त है वही लोग अध्यात्म और गुरुकुल पर बड़ी बड़ी बात करते है | उनका सामाजिकता एक मात्र छलावा है |
आज की शिक्षा इस हद तक महँगी हो गयी है की लोग अपराध को अपना व्यवसाय मान लिए है| इसके बावजूद सरकार, सरकारी स्कूलों को बंद करके मधुशाला खोलने पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दी है |
देश के सम्मानित माननीय लोग गरीब को गड्ढा और अमीर को उस गड्ढे पर बहुमंजिला इमारत का ख्वाब दिखातें है। आखिर क्यों ?
30 बच्चों से कम वाले विद्यालय से सरकार को घाटा था इसलिए मदिरालय से फायदा कमाने का जुगाड़ बनाया | अगर मान भी लिया जाये की सरकार को घाटा था तो उन बच्चों का आगे की पढ़ाई जारी रहे उसके लिए उन्होंने क्या उपाय किया ? क्या बच्चों को स्कूल तक जाने-आने का वाहन का व्यवस्था किया गया ? आखिर वो बच्चे कैसे उस पाठशाला तक जायेंगे आएंगे ? अगर एक गरीब पहुंचाने और लाने का काम करेगा तो वो किस वक्त कमाने जायेगा ?
लगता है गरीब से गरीबी और शिक्षा को महंगाई से ख़त्म कर दी जाएगी! क्या ऐसी व्यवस्था से भारत का भविष्य सुनहरा होगा या अंधकारमय ?
भारत के भाग्य का विधाता कौन ?



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