भारत का भाग्य विधाता ही जाने !!!
भारत जैसे विशाल देश में योग्यता की कमी नहीं और न ही संसाधन की कमी | आज योग्यता के बावजूद युवक, युवतियां से पीछे है |
ये एक सामाजिक समस्या भी है और विविशता भी | भारत में जहाँ महिलाओं को तमाम कुरूतियों से बांध दिया गया था जो की पारिवारिक विकाश के लिए बहुत बड़ा बाधक बन गया था | भारत में महिलाओं के जीवनउत्थान के लिए पुरुष समाज ने भी बहुत योगदान दिया है तो वहीँ कुछ महिलाओं ने भी समाज की तमाम कुरूतियों को दरकिनार करते हुए संघर्ष किया है |
एक उत्तम परिवार की पहचान शिक्षा से ही होती है | उस परिवार की सामाजिक व्यवस्था को उसकी आमदनी जीवनशैली को बदल देती है | ये तभी संभव है जब महिला शिक्षित और रोजगारयुक्त हों |
सरकार ने भी महिला उत्थान के लिए वजीफा देकर उत्साहित किया है जो बेहद सराहनीय भी है |
महिला या पुरुष को शिक्षित होना आज के युग में बेहद जरुरी है लेकिन कुछ ऐसी समस्या समाज में है जो भद्रा समाज के लिए निराशाजनक हो गया है | हमारे एक मित्र ने कहा की मैं 49 वर्ष की उम्र में मैं उतना जलील कभी नहीं हुआ जितना की आज महसूस कर रहा हूँ | आगे उन्होंने कहा की मेरा अनुभव मेरी कमजोरी बन गया था | अनुभव के आधार पर काम मिला ठीक ठाक वेतन मिलता था लेकिन एक हमसे ज्यादा शिक्षित और कम उम्र की महिला ने मेरे अनुभव पर पानी फेर दिया | कारण पूछने पर उन्होंने यही कहा की मेरा वेतन 31500 रूपए प्रतिमाह था | मैं जिस काम को करता हूँ अब उसी काम को करने के लिए एक महिला मात्र 15000 रूपए की पगार पर तैयार हो गयी नतीजा मालिक ने उस महिला को रखकर हमें बहार का रास्ता दिखा दिया | अब तुम बताओ की इस उम्र में मुझे कोई क्यो रखना चाहेगा जब उसी काम के लिए लोग कम वेतन में करने को तैयार है ?
उक्त बात को सुनकर मेरे जेहन में एक बात जगी की उस महिला से भी सवाल किया जाना चाहिए | मन में जिज्ञासा था इसलिए उस महिला से मिलने का बहाना बनाकर येन केन प्रकारेण प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिला |
तब मैं बेरोजगार होने का हवाला देकर उस कंपनी में पहुचने का रास्ता बना लिया | सभी सवाल जवाब के बाद जब मुझसे वेतन के बारे में पूछा गया तो हमने अधिकतम दस हजार तक बोल दिया | इस बात को सुनकर कंपनी के एचआर ने रुकने को बोला और अपने बॉस के पास चला गया | उस दौरान मै बहुत उत्सुकता से एचआर का इन्तजार करता रहा | बेसब्री ख़त्म हो गया मेरे सामने एचआर ने एक लेटर देते हुए कहा की आप अगले सोमवार से कंपनी ज्वाइन कर सकते है | मैं आश्चर्य में डूब गया | मेरा उस महिला से मिलने की उत्सुकता और तड़पने लगी एक हफ्ता कैसे बीता पता ही नहीं चला | जब मैं सोमवार को कम्पनी गया तो मेरे सामने वही महिला मिली जो मात्र 15000 रूपए की पगार पर काम कर रही थी पर बहुत उदास थी | मैंने उसका परिचय लिया और अपना भी दिया | बातों ही बातों में मैंने उसके उदासी का कारण पूछ बैठा | बोलना तो वो नहीं चाहती थी लेकिन गुस्से में बोल उठी की कंपनी को फ़ोकट में काम करने वाला मिले तो ये किसी की मजबूरी बिना सोचे निकाल बाहर कर सकते है
मेरा साहस बढ़ा और पूछ बैठा आप होनहार है शादीशुदा है आपको देखने से नहीं लगता की आपको किसी काम की जरुरत है! तब वो महिला बोली, ऐसा कुछ भी नहीं है मेरे पति इंश्योरेंस कंपनी में एजेंट है महीने में बतौर कमीशन 18000 तक ही मिलता है अभी हमारी कच्ची गृहस्ती है जिसके चलते मुझे बाहर काम करना पड़ता है ताकि दिन बढ़िया से बीते |
उस महिला ने ख़ुशी और गम दोनों बातें की , तब मैं जाते जाते उस महिला से कहा आप कल फिर से अपने काम पर चली जाएँ मुझे नौकरी की आवश्यकता नहीं | मुझे आप तक पहुंचना था इसलिए बेरोजगार का बहना बना कर आप तक पंहुचा हूँ उस महिला ने कारण पूछा तब हमने अपने मित्र के साथ घटित घटना का जिक्र कर दिया | वो ये बात सुन कर निराश जरूर दिखी लेकिन मैं वहां से चलते बना |
आज महिला कई कारणों से कम वेतन में नौकरी करती है अच्छे खासे घर की महिलाएं टाइम पास करने के लिए कम वेतन में काम करती है , कुछ की मजबूरिया होती है , कुछ महिला घर के खर्च में हाथ बटाने के लिए जॉब करती है बहुत कारण है लेकिन सबसे बड़ा कारण जो सामने था वो है कम वेतन में ख़ुशी ख़ुशी नौकरी करना |
भारत के इतिहास में हमारे समाज को पुरुष प्रधान समाज कहा जाता था लेकिन जब हमारे देश में महिलाओं ने देश सेवा के लिए अपनी जान लगा दी तब से ये बात कमोत्तेर सुनने को मिलता है| वर्तमान में जिसमें योग्यता है उसे उस क्षेत्र में नौकरी मिल रहा है और महिलाएं संग संग कर भी रही है|
सरकार का निजी संस्थानों के लिए सिर्फ कागजी नियम है उन नियमों में भी अजब गजब का फायदा दिया गया है वो संस्था ही कर सकता है कर्मचारी नहीं | निजी संस्थानों की बेलगाम नियम उनका खुद का होता है जहाँ पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता |
आज महिलाये स्कूलों, कॉलेजों, निजी बैंक, ऑफिस, बाजार, बीमा सेक्टर, लघु उद्योग इत्यादि जगहों पर बेहद कम वेतन पर काम करती मिल जाएँगी | जब की उसी काम को पुरुष नहीं कर सकता | आज सफल वही लोग है जिनके परिवार का हर सदस्य कुछ न कुछ काम करता हो |
बराबरी का ये नतोजा किसके लिए फायदेमंद है स्वाभाविक है ये सभी फायदा निजी संस्थानों पर लागु है जहाँ लोग आठ घंटे की जगह दस से बारह घंटे काम करने को मजबूर है | जहाँ व्यक्ति का स्वास्थ्य गिरता है वही भारी क़र्ज़ से दबी ज़िन्दगी से आजिज आकर ख़ुदकुशी तक कर लेता है |
बढती महंगाई में दस या पंद्रह हजार की नौकरी क्या मायने रखता है? उनके भविष्य के लिए सरकार ने क्या किया | तमाम योजना बिन पेंदी की लोटा की तरह बना है| सरकार खुद दोषी है अन्यथा वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन 500 या 1000 प्रति माह नहीं देती |
... राशो



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