भारत का भाग्य विधाता मौन क्यों ?
राजनीति ने किया शिक्षा का पतन
हां यही शिक्षा तो......
हां यही शिक्षा को
योगियों ने अपनो से दूर करे है।
काहे शिक्षा पे इतना गुरुर करे है।
गुरुर करे है।
शिक्षा में सुधार तभी होगा जब सरकार अपने ही बनाये नियमों में संसोधन करे | सरकार ने हमेशा अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए आम जनता को गुमराह करते हुए सरकारी कर्मचारियों के हीत के लिए काम किया है |
देखा जाये तो ये कर्मचारी कभी भी संतुष्ट नहीं होते, बावजूद सरकार का पूरा फोकस इन्ही की इर्दगिर्द रहता है |
सरकारी शैक्षणिक संस्था तभी बच या रह सकती है जब सरकारी कर्मचारियों के पारिवारिक शैक्षणिक अनिवार्यता लागु की जाएगी जैसे -
(१) सरकार द्वारा दी जानी वाली सुविधा भी सरकारी हो | अगर छात्र निम्न या मध्य शिक्षा सरकारी विद्यालय से पढ़ रहा हो उसके पढ़ाई में वार्षिक ४० हजार का खर्चा हो तो उसका ७५ प्रतिशत सरकार वहन करेगी |
(२) जो सरकारी कर्मचारी अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय की जगह किसी निजी संस्था से पढ़ाता हो तो उसके फीस का मात्र २५ प्रतिशत सरकार वहन करेगी |
(३) एक्स्ट्रा फीस, ड्रेस, कॉपी, किताब, वाहन आदि का खर्च सरकार वहन नहीं करेगी |
(४) गरीब, मध्य वर्गीय वो लोग जिनकी वार्षिक आय दो लाख से कम है उसका पुरा फीस माफ़ कर दी जाये|
(५) गरीब, मध्य वर्गीय वो लोग जिनकी वार्षिक आय दो लाख से कम है उन्हें एक्स्ट्रा फीस, ड्रेस, कॉपी, किताब, वाहन आदि का खर्च सरकार वहन करे |
(६) दस प्राथमिक विद्यालय के बीच एक महाविद्यालय की व्यवस्था हो|
(७) सभी विद्यालय के शिक्षकों के पढ़ाने की नीति की समयवद्ध जाँच हो |
(८) सभी शिक्षकों का ड्रेस कोड निर्धरित हो |
(९) नशामुक्त सभी शिक्षक एवं कर्मचारी होना अनिवार्य हो |
(१०) किसी भी सरकारी कर्मचारियों के बच्चे को उच्च शिक्षा के लिए कोई भी सरकारी सुविधा न हो |
(११) सरकारी विद्यालय से पास बच्चे ही सरकारी महाविद्यालय के लिए पात्र होंगे, चाहे किसी भी संकाय में प्रवेश लेता हो |
(१२) जाति या धर्म आधारित प्रवेश वर्जित हो...
सरकार द्वारा शैक्षणिक नीतिपरिवर्तन से ही प्रायःमिक, माध्यमिक या उच्च शिक्षा का समुचित विकाश होगा|

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